पंचमुखी शिक्षा – विद्यालय में बालक के सर्वांगपूर्ण विकास की दृष्टि से पंचमुखी शिक्षा की व्यवस्था है। इस पंचमुखी शिक्षा के निम्नलिखित अंग 1. शारीरिक शिक्षा 2. व्यवसायिक शिक्षा 3. मानसिक शिक्षा 4. नैतिक शिक्षा 5. आध्यात्मिक शिक्षा। पंचपदी शिक्षण पद्धति – प्रत्येक विषय के पाठ्यक्रम के पाँच पद निश्चित किये गये हैं। 1. अधीति (अध्यापक कार्य) 2. बोध (कक्षा कार्य) 3. अभ्यास (गृह कार्य) 4. प्रयोग (सह पाठ्यक्रिया) 5. प्रसार अभिभावक सम्पर्क – बालक की दैनिक गतिविधियों की जानकारी हेतु अभिभावक सम्पर्क की व्यवस्था है। इससे बालक व आचार्य के बीच प्रगाढ़ता बढ़ती है। साथ ही बालक के विषय में विस्तृत जानकारी होती है। कृपया आचार्य के घर आने पर आप छात्र के विषय में वार्ता करें। अभिभावक सम्मेलन – बालक का समुचित विकास हो इस हेतु हमारा और आपका दायित्व समान है। बालकों की विद्यालय सम्बन्धी जानकारी देने तथा उनकी विविध समस्याओं पर सामूहिक विचार विमर्श हेतु अभिभावक सम्मेलनों का आयोजन होता है।
इसके बहुमूल्य सुझाव हमें शिक्षा दे सकें, इस हेतु आपकी उपस्थिति हमारे लिए प्रेरणादायक होगी। छात्र संसद – व्यवस्था, कार्यक्रम संचालन तथा स्वानुशासन की अनुभूति करने के लिए बालकों का अपना संगठन है। इस व्यवस्था से बालकों को जनतंत्रात्मक प्रणाली का बोध होने के साथ उनमें दायित्व के प्रति आस्था का विकास होता है। छात्र न्यायालय – छात्रों की शिकायतें सुनने व उचित निर्णय देने हेतु विद्यालय में छात्रों का अपना न्यायालय है। इससे छात्रों की निर्णयात्मक शक्ति का विकास होता है और विद्यालय का अनुशासन स्वभावतः ही ठीक रहता है।
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